बिखरे हुए तिनकों से बसते हैं घरोंदे मगर

टूटता नहीं अब भी जो ठहर गया है आप तक आके ,
बनती नहीं है मंजिल नीव को हिल के ,
ठहरा हुआ है साहिल इंतज़ार में लेकिन ,
रुकती नहीं लहर अपनी हस्ती मिटा के I

बिखरे हुए तिनकों से बसते हैं घरोंदे मगर ,
जुड़ती नहीं है तकदीर किसी मौड़ पर आके ,
है खोबसूरत बहुत मंजिल की कशिश लेकिन '
मिलती है जाने कितने अश्कों को मिटा के I